Wednesday, 5 November 2025

मध्यप्रदेश सरकार का अन्नदाता के हित में एक बहुत ही सराहनीय फैसला


गाँव और किसान की स्थिति आज आजादी के 70 साल बाद भी उतनी अच्छी नहीं है, जैसी कि होनी चाहिए, ऐसी स्थिति में मध्यप्रदेश सरकार का किसान अन्नदाता के हित में यह एक बहुत ही सराहनीय फैसला है। निश्चित ही इसके दूरगामी परिणाम बेहद अच्छे आयेंगे। गाँव और किसान की स्थिति पर ध्यान दिया ही जाना चाहिए।

देश-दुनिया की तरह मध्यप्रदेश में भी शहरों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इसी के साथ स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता और पोषण युक्त आहार की डिमांड भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा राज्य में सब्जी उत्पादन पर फोकस किया जा रहा है। प्रदेश का उद्यानिकी विभाग राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत देशी-सब्जियों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने में लगा है। इसके अंतर्गत बड़े शहरों के आसपास स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखते हुए देशी-सब्जियों की उन्नत किस्म के क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। खास बात यह है कि इसके लिए किसानों को सरकार प्रति हेक्टेयर हजारों रुपए का अनुदान भी देगी। प्रदेश के सभी 10 संभागों में इस योजना का लाभ मिलेगा।

आज प्रदेशभर के शहरों में ताजी सब्जियों की न केवल डिमांड बढ़ रही है, बल्कि इनके लिए लोग मुंहमांगे दाम चुकाने के लिए भी तैयार रहते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत प्रदेश का उद्यानिकी विभाग राज्य भर में शहरी इलाकों के आसपास देशी सब्जियों की नई और उन्नत किस्मों के उत्पादन के लिए सब्जी क्लस्टर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है।

उद्यानिकी आयुक्त अरविन्द दुबे के अनुसार विभाग द्वारा प्रदेश के सभी 10 संभागों के जिलों के नगरीय इलाकों के आसपास परंपरागत सब्जियों की नई उन्नत किस्में लगाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें तोरई, गिलकी, परवल, चिचिंडा, लौकी, करेला, टिंडा, खीरा, बैंगन, मुनगा, कुंदरु, चौलाई, पालक, पोई साग, गरूणी, भाजी, कचरी, अरबी, शकरकंद, कसावड़, कटुक, स्टार गूसबेरी जैसी सब्जियां शामिल हैं।

उद्यानिकी विभाग सब्जी फसलों के उत्पादन पर किसानों को अनुदान के रूप में आर्थिक सहायता देगा। इसमें 40 प्रतिशत तक अनुदान देने का प्रावधान है। किसानों को निर्धारित इकाई लागत 60 हजार प्रति हेक्टेयर पर 24 हजार रुपए तक का अनुदान दिया जाएगा। योजना का लाभ लेने के लिए सब्जी उत्पादकों को एमपी एफएसटीएस पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। योजना से जुड़ने के लिए किसानों के पास स्वयं की भूमि और सिंचाई सुविधा होना चाहिए। इन किसानों को उद्यानिकी विभाग द्वारा सब्जी उत्पादन तकनीकी और बिक्री आदि के लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाएगा।

मुकुट सक्सेना 

Monday, 27 March 2017

सरपंच-सचिवो के लिए 1 साल भी जेल रहना पड़े तो परवाह नहीं

जेल से रिहा हुए पंचायत सचिव संगठन के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश शर्मा, सरपंच संघ के अध्यक्ष निर्भय सिंह यादव, सोमेश गुप्ता बोले



भोपालl जैसा कि तय था सरपंच सचिवों की मांगों के लिए अपर मुख्य सचिव जुलानिया के कमरे पर ताला बंदी करने के लिए जुलानिया का पुतला बना कर मंत्रालय पर ताला बंदी करने जाते समय पंचायत सचिव संगठन के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश शर्मा, सरपंच संघ के अध्यक्ष निर्भय सिंह यादव, सोमेश गुप्ता को पुलिस ने रास्ते में गिरफ्तार कर लिया. फिर भी सरपंच संगठन के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष सोमेश गुप्ता व पंचायत सचिव संगठन के प्रदेश पदाधिकारी ने अपने ऊपर केरोसिन डाल कर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार किया था.
पुलिस ने बड़े आंदोलन के डर से अध्यक्षों को गिरप्तार कर केंद्रीय जेल भोपाल में ले गयी थी, संगठन के दबाव में 5 घंटे में प्रदेश के अध्यक्षों को रिहा करना पड़ा. रिहा होते ही तीनों ने वापिस कहा है कि सरपंच सचिवो के लिए 1 साल भी जेल रहना पड़े तो परवाह नहीं.

Friday, 29 July 2011

किसान से रखें आत्मीय सम्बन्ध


         यदि पटवारी ग्रामवासियों/कृषकों से आत्मीय सम्बन्ध बना ले तो इससे कई समस्यायों के निराकरण में सकारात्मक परिणाम सामने आना निश्चत है. आज भी किसान पटवारी को बहुत कुछ मानकर चलता है, जब हम ग्राम भ्रमण के समय उसके घर भोजन करते हैं, तब वह अपने को धन्य समझता है. इसके बाबजूद कुछ गलत विचारधाराओं में पड़कर हमारा व्यवहार उसके प्रति गड़बड़ी के रूप में यदा-कदा सामने आता रहता है, हमें चाहिए हम इस पर कंट्रोल करें. उसके प्रति और ज्यादा ध्यान रखकर काम करने की आज महती आवश्यकता है.
         हम गाँव में अच्छे  समाजसेवी साबित हो सकते हैं. हम अपना काम राजस्व तक सीमित न रखते हुए गाँव में सामाजिक कुरीतियों धूम्रपान,नशामुक्ति जैसी बुराइयों  के खिलाफ काफी अच्छा काम कर सकते हैं. हम गाँव को स्वच्छता के प्रति जागरूक कर "हमारा मध्य प्रदेश, स्वच्छ प्रदेश, स्वच्छ गाँव, स्वच्छ नागरिक" में अच्छा योगदान कर सकते हैं. साथ  ही इस तरह काम करने से जो प्रसन्नता  मिलेगी उससे आपको भी एक अलग ऊर्जा मिलेगी. आपका मन अन्दर तक खिल उठेगा.
          कोई आपके हलके का कृषक बीमार हो आप उसे देखने अस्पताल तक चले जाएँ, संभब सहायता करें, तो उसके स्वस्थ  होने की दिशा में अनुकूल प्रभाब पड़ता है, आपको भी इसका लाभ महसूस अवश्य होगा.
मुझे गर्व है कि हमारे कई साथी इस दिशा में काम कर रहे हैं, विशेषकर नए युवासाथियों से उम्मीद करता हूँ कि वे इस दिशा में और प्रगति लायेंगे.. https://www.mppatwari.com 

Thursday, 28 July 2011

खबर का असर... अब मिलेगी सही नकल

         शासन के करोंड़ो खर्चो के वावजूद किसान परेशान, सही नकल नही मिलती, शीर्षक से खजुराहों अधिवेंषन अवसर पर प्रकाशित स्मारिका ‘‘लाल बस्ता’’ में प्रकाशित किया गया था, जो पूर्व सहा.अधीक्षक  भू अभिलेख,विदिशा श्री रामबाबू श्रीवास्तव द्वारा लिखा गया था,  यहाँ जस का तस  दिया जा रहा है, पर शासन नें कार्यवाही की और  विदिशा  को सबसे पहले "माडल पायलट प्रोजेक्ट" के लिये चयन किया। 

अब मिलेगी कृषको को सही नकल।

         पटवारी खसरा कम्प्यूटरीकरण का कार्य 1994 से चल रहा है, किन्तु पटवारी खसरा के 12 खानों का अपडे़शन कार्य 15 वर्षो में भी पूर्ण नहीं हो सका है।
         तहसील से प्रतिमाह पटवारी खसरा के अपडेशन का प्रमाण पत्र ऊपर भेजा जाता है, लेकिन फिर भी जब कोई कृषक नकल निकलवाने आता है, तब सही नकल नहीं मिलती। तब पटवारी को बुलाकार सत्यापन कराया जाता है। ऐसें में कम्प्यूटरीकरण का क्या औचित्य है जबकि सिर्फ कम्प्यूटीकृत नकल देने के लिए शासन प्रतिवर्ष करोंड़ों रूपया कम्प्यूटर रख-रखाव, वेतन, भत्ते आदि पर व्यय कर रहा है। इन करोड़ों रूपयों का दुरूपयोग हो रहा है।
         यह भी उल्लेखनीय है कि
इंटरनेट बैकिंग/ए.टी.एम. द्वारा जमा/निकासी का प्रतिपल परिवर्तन के बाबजूद अद्यतन हिसाब रखा जाता है और विश्वसनीय भी होता है। बैंको में एक दिन के परिवर्तन के बराबर राजस्व भू-अभिलेख में परिवर्तन माह में भी नही होता फिर भी अपडेट नहीं हो पाता। विचारणीय है, क्या कारण है कि बम्बई में रूपयें जमा कर दिल्ली में हिसाब कर सकते हैं, किन्तु तहसील कार्यालय में लगे हुये कमरें में रिकार्ड संशोधन नहीं हो पाता?आखिर अपडेशन कार्य क्यों नहीं हो पा रहा है?
 शायद इसलियें क्योकिं गलत नकल निकलने में ही कम्प्यूटर आपरेटर या अन्य 


 नकल देने वालों को लाभ है, इसलिये वह रूचि नहीं लेते, और इनके ऊपर के लोगों को भी यह बात केवल अपना नफा-नुकसान पर ही सिमटकर रह जाती है। परिणाम शासन के प्रतिवर्ष करोडों खर्च के बाबजूद किसान परेशान है और शासन घाटे में।
         शासन इस मामलें को गंभीरता से ले और पटवारियों से खसरा बी-1 लेखन बंद करवाकर उन्हें कम्प्यूटीकृत खसरा बी-1, सेट प्रदाय करें। समय पर होने वाले संशोधन के आदेश भी पटवारी के साथ सीधें कम्प्यूटर में अमल के लिये जाने लगें तो एक ओर जहां किसान 
को सही नकल मिलेगी, शासन की कृषक हित की  मंशा पूरी होगीं, वहीं दूसरी ओर पटवारी के काम का बोझ कुछ कम होगा, समय बचेगा इस बचे हुये समय में पटवारी को गश्त/वसूली कार्य आदि में लगाया जाकर शासन हित में लाभ अर्जित किया जा सकता  है। 
... लेकिन आज भी स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हो सका और किसान परेशान हैै।  


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